किसान अध्यादेश पर NDA में दरार, अकाली दल से केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर का इस्तीफा

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मोदी सरकार के किसान अध्यादेश के विरोध में दिया गया इस्तीफा राष्ट्रपति ने किया स्वीकार। नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपी गई विभाग की जिम्मेवारी। NDA के घटक दल अकाली दल कोटे से थी कैबिनेट मंत्री हरसिमरत कौर

संसद में पारित किए गए कृषि अध्यादेश पर अब NDA में कलह सतह पर आ गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब सरकार के सहयोगी दल भी इस मुद्दे पर सरकार का विरोध करते दिख रहे है। इसी क्रम में NDA में अकाली दल से केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने सरकार के इस बिल के विरोध में अपना इस्तीफा दे दिया है। अकाली नेता के इस्तीफे को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने स्वीकार भी कर लिया है।

केंद्र की मोदी सरकार ने अपने कृषि सुधार एजेंडे पर चलते हुए हालही में 3 अहम बिल संसद में पेश किए है। जिनको विपक्ष सहित सरकार में शामिल दलों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में तमाम विपक्षी पार्टियों ने इन बिलों को किसान विरोधी बताते हुए भारी विरोध किया है। साथ ही देश के विभिन्न भागों में किसानों ने जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन भी किया है।

कौन से है ये 3 बिल

सरकार द्वारा संसद में कृषि सुधार के लिए 3 बिल पारित किए गए है।

1:-लोकसभा में कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य, संवर्द्धन और सुविधा विधेयक-2020 इस बिल के अंतर्गत एक ऐसे इकोसिस्टम को बनाने की योजना है जहां किसान और व्यपारी विभिन्न राज्यो से कृषि उपज विपणन विधानों के तहत अधिसूचित बाजारों के परिसरों से या अन्य बाजारों से बाहर पारदर्शी और निर्बाध विकल्पों से किसानों की उपज खरीद-बिक्री कर सकें।

2:-कृषक सशक्तिकरण एवं संरक्षण, कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 इस बिल में कृषि समझौतों पर एक राष्‍ट्रीय ढांचे का प्रावधान है। जो किसानों को कृषि व्‍यापार फर्मों, प्रोसेसरों, थोक विक्रेताओं, निर्यातकों या बड़े खुदरा विक्रेताओं के साथ कृषि सेवाओं और उचित तथा पारदर्शी तरीके से आपसी सहमति वाला लाभदायक मूल्‍य ढांचा उपलब्ध कराता है।

3:-आवश्यक वस्तु (संशोधन) : अनाज, दलहन, खाद्य तेल, आलू-प्याज अनिवार्य वस्तु नहीं रहेगी। इनका भंडारण होगा। कृषि में विदेशी निवेश आकर्षित होगा।

किसान विरोध में क्यो ?

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बिल का विरोध करने वालों का कहना है कि इस बिल से मंडियों के खत्म होने का खतरा है। अगर एक बार मंडिया खत्म हुई तो किसानों को एमएसपी( न्यूनतम समर्थन मूल्य) नही मिल पायेगा।

कीमतें तय करने का कोई मैकेनिज्म नहीं है। ऐसी स्थिति में किसानों को डर है कि इससे निजी कंपनियों को किसानों के शोषण का जरिया मिल जाएगा। किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर बन जाएगा।

विरोधियों का ये भी मत है कारोबारी जमाखोरी करेंगे। इससे कीमतों में अस्थिरता आएगी इससे बेतहाशा महंगाई से आम जनमानस की समस्याएं बढ़ेंगी। खाद्य सुरक्षा खत्म हो जाएगी इससे आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी बढ़ सकती है।

हालांकि तमाम विरोधों के बावजूद सरकार इन सभी बिल को संसद में पारित करवाने में सफल रही है ।
इस पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि “कई ताकतें किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं” और उन्होंने कृषक समुदाय को आश्वासन दिया है कि उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सरकार की खरीद उनके लिए कई अन्य विकल्पों के साथ जारी रहेगी।